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क़ुरआन के मार्गदर्शन पर मानव का दृष्टिकोण: ईमान और कुफ़्र के बीच

सूरह अल-बक़रह की ये आयतें पवित्र क़ुरआन की सत्यता और निसंदेह ग्रंथ होने की पुष्टि के साथ शुरू होती हैं, जो उन डरने वालों (मुत्तक़ीन) के लिए मार्गदर्शन है जो अनदेखी बातों पर ईमान लाते हैं, नमाज़ क़ाइम करते हैं, दिए गए रिज़्क़ में से खर्च करते हैं और वहियों व आख़िरत पर यक़ीन रखते हैं। इसके विपरीत, ये आयतें उन लोगों की दशा दर्शाती हैं जो इस क़ुरआन का इनकार करते हैं; उनके दिल और कान इस किताब के प्रकाश से महरूम होकर सील कर दिए जाते हैं। अतः क़ुरआन वह कसौटी है जो मार्गदर्शन स्वीकार करने वालों और हठधर्मिता के कारण उससे वंचित रहने वालों में अंतर करती है।